दिल्ली के हिंदी भवन में आयोजित “ढाई आखर: विरासत से भविष्य तक” साहित्योत्सव केवल एक आयोजन नहीं रहा, बल्कि ढाई दिनों तक चलने वाला एक जीवंत साहित्यिक अनुभव बना- जहाँ शब्दों ने विचारों को जन्म दिया, संवाद ने सरोकारों को आकार दिया और सृजन ने एक नई दिशा की ओर संकेत किया।
“ढाई आखर: विरासत से भविष्य तक” केवल एक शीर्षक नहीं, बल्कि एक विचार है- एक ऐसी यात्रा, जो हमारी समृद्ध साहित्यिक विरासत की गहराइयों से शुरू होकर भविष्य की नई संभावनाओं तक पहुँचती है। यह पहल उन शब्दों, संवेदनाओं और अनुभवों को एक मंच पर लाने का प्रयास है, जिन्होंने पीढ़ियों को जोड़ा है और आज भी समाज को दिशा देने की क्षमता रखते हैं। इस यात्रा में परंपरा और आधुनिकता का सुंदर संगम दिखाई देता है, जहाँ पुराने विचार नई दृष्टि के साथ संवाद करते हैं और साहित्य केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि समय, समाज और मानवीय भावनाओं का जीवंत दस्तावेज बनकर उभरा है। यह महोत्सव अपने स्वरूप, सहभागिता और विषय-विविधता के कारण हिंदी भवन के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुआ।
प्रथम दिवस: आगाज, आत्मा और साहित्य की ऊर्जा का उदय
उद्घाटन दिवस का माहौल शुरू से ही एक विशेष ऊर्जा से भरा हुआ था। जब डॉ. गतिकृष्णा के सितार की मधुर धुनों के साथ सरस्वती वंदना हुई, तो सभागार का वातावरण मानो आध्यात्मिक चेतना से भर गया।
मुख्य अतिथि गजेंद्र सिंह शेखावत और प्रसून जोशी की उपस्थिति ने आयोजन को गरिमा और गंभीरता प्रदान की। अपने संबोधन में गजेंद्र सिंह शेखावत ने भारतीय भाषाओं को राष्ट्र की आत्मा बताते हुए कहा कि भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी पहचान और साहित्यिक चेतना का आधार है। उन्होंने नई पीढ़ी को अपनी भाषाई विरासत से जोड़ने की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया।
इसके बाद विशिष्ट अतिथि प्रसून जोशी और वरिष्ठ पत्रकार राजीव रंजन के बीच हुआ संवाद इस सत्र का बौद्धिक केंद्र बना। प्रसून जोशी ने कहा कि आज के दौर में अभिव्यक्ति के मंच बढ़े हैं, लेकिन इसके साथ जिम्मेदारी भी उतनी ही बढ़ी है। उन्होंने भाषा को “संवेदना की जड़” बताते हुए यह भी कहा कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएँ किसी प्रतिस्पर्धा में नहीं, बल्कि एक साझा सांस्कृतिक स्रोत से जुड़ी हुई हैं।
दिन का समापन लोकगायक प्रहलाद टिपानिया की प्रस्तुति से हुआ। कबीर की वाणी- “गुरु शरण में रहना मन तू” और “राम बिना कोई धाम नहीं”- ने पूरे सभागार को एक ऐसी भावभूमि में पहुँचा दिया, जहाँ शब्द केवल सुने नहीं, बल्कि महसूस किए गए।
द्वितीय दिवसः परंपरा की छाँव, नए विमर्श और सिनेमा की दृष्टि
दूसरे दिन की शुरुआत “बरगद की छाँव में” सत्र से हुई, जो अपने आप में एक प्रतीकात्मक और गहन अनुभव था। नंदकिशोर आचार्य, अरुण कमल, उदय प्रकाश और रामेश्वर राय जैसे वरिष्ठ रचनाकारों ने कविता को केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि समय का साक्ष्य बताया। “बरगद” यहाँ एक जीवंत रूपक बनकर उभरा- जो पीढ़ियों की स्मृतियों और अनुभवों को अपने भीतर समेटे रहता है।
इसके बाद “क’ से कविता” सत्र ने युवा रचनात्मक ऊर्जा को सामने रखा। बाबुषा कोहली, आशुतोष अग्निहोत्री, दीपक जायसवाल और डॉ. सत्येंद्र शुक्ल ने यह स्पष्ट किया कि कविता कोई तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि दीर्घ अनुभव और संवेदना की उपज है।
“आधी दुनिया… पूरा फसाना…” सत्र ने स्त्री विमर्श को केंद्र में रखा। ममता कालिया, अनामिका, निर्मला पुतुल और गरिमा श्रीवास्तव ने स्त्री अनुभव की बहुस्तरीयता को रेखांकित किया। यहाँ यह बात उभरकर आई कि स्त्री लेखन केवल निजी अनुभव नहीं, बल्कि सामाजिक संरचनाओं का सशक्त दस्तावेज भी है।
“बायोस्कोप” सत्र में सुधीर मिश्रा ने सिनेमा को समाज का दर्पण बताते हुए अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि कैसे अलग-अलग शहरों और परिस्थितियों ने उनके सिनेमा को आकार दिया।
“दो-आब: एक यात्रा” में संजीव सर्राफ ने इस बात पर जोर दिया कि तकनीक ने भाषा के प्रसार को पहले से कहीं अधिक व्यापक और सुलभ बना दिया है। उन्होंने यह भी साझा किया कि ‘रेख्ता’ ने न सिर्फ पुराने साहित्य को सहेजने का काम किया है, बल्कि नए लेखकों और पाठकों के बीच एक सशक्त सेतु भी बनाया है।
‘रेख्ता’ साहित्य के नए विमर्शों, नई भाषा-शैली और नए पाठक वर्ग को जन्म देने वाला मंच भी है। यथा तकनीक का सही उपयोग किया जाए, तो भाषा की सीमाएँ टूटती हैं और साहित्य एक वैश्विक संवाद का हिस्सा बन जाता है।
“रंग, अभिनय, रंगमंच” सत्र में सौरभ शुक्ला और चित्रंजन त्रिपाठी के साथ राहुल मित्रा की बातचीत ने थिएटर और अभिनय की दुनिया को बेहद जीवंत ढंग से सामने रखा। इस संवाद में सौरभ शुक्ला ने अपने रंगमंच से फिल्मों और वेब सीरीज तक के सफर को साझा करते हुए बताया कि अभिनय की असली जड़ें हमेशा मंच से ही आती हैं, जहाँ कलाकार को हर पल खुद को साबित करना होता है। उन्होंने यह भी कहा कि थिएटर कलाकार को धैर्य, अनुशासन और संवेदनशीलता सिखाता है, जो आगे चलकर हर माध्यम में काम आती है।
वहीं चित्रंजन त्रिपाठी ने अपने अनुभवों के माध्यम से यह रेखांकित किया कि रंगमंच केवल अभिनय का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को समझने और उससे संवाद करने का एक सशक्त जरिया है। उन्होंने बताया कि मंच पर निभाए गए किरदार कलाकार के भीतर गहराई तक उतर जाते हैं और उसे एक बेहतर इंसान भी बनाते हैं।
दिन का सबसे भावनात्मक सत्र “दास्तान-ए-साहिर” रहा, जहाँ हिमांशु वाजपेयी और प्रज्ञा शर्मा ने साहिर लुधियानवी की जिंदगी को जीवंत कर दिया।
साहिर लुधियानवी से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा श्रोताओं के बीच खासा चर्चित रहा। साहिर अपने स्वाभिमान और शब्दों की कीमत को लेकर बेहद सजग रहते थे। एक बार जब फिल्म के लिए गीत लिखने की बात हुई, तो उन्होंने साफ कह दिया कि उन्हें उस समय के मशहूर संगीतकार से भी ज्यादा मेहनताना चाहिए। जब यह बात हैरानी के साथ पूछी गई, तो साहिर का जवाब था- “धुन तो बाद में भी याद रह सकती है, लेकिन गीत ही वो चीज है जो लोगों के दिलों में बसता है।” उनकी इस बात ने न केवल उनकी शख्सियत का आत्मविश्वास दिखाया, बल्कि यह भी साबित किया कि वे अपने लेखन और उसकी अहमियत को कितनी गंभीरता से लेते थे।
तृतीय दिवस: पत्रकारिता, नई पीढ़ी और रंगमंच का उत्कर्ष
तीसरे दिन की शुरुआत “साहित्यिक पत्रकारिता” सत्र से हुई, जो अपने आप में विचारों की गंभीरता और संवेदनाओं की गहराई से भरा रहा। इस सत्र में ओम थानवी, प्रेम जनमेजय और हरिशंकर राठी जैसे अनुभवी और प्रतिष्ठित लेखक-पत्रकारों ने भाग लिया। ओम थानवी, ने साहित्य और पत्रकारिता के संबंध को एक जिम्मेदार सामाजिक भूमिका के रूप में रेखांकित किया। वहीं प्रेम जनमेजय ने अपने व्यंग्यात्मक अंदाज में यह बताया कि साहित्यिक पत्रकारिता केवल तथ्यों की प्रस्तुति नहीं, बल्कि समाज की विसंगतियों को उजागर करने का एक सशक्त माध्यम भी है।
जब खबरें तेजी से बदलती हैं और सूचनाओं की भरमार है, तब साहित्यिक पत्रकारिता की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यह न केवल सूचना देती है, बल्कि पाठकों को सोचने, समझने और समाज के प्रति सजग होने की प्रेरणा भी देती है।
“चौथा खंभा” सत्र में आशीष पाण्डेय, राजीव रंजन, संकेत उपाध्याय और रूपेश कुमार शुक्ल ने मीडिया के बदलते स्वरूप पर गंभीर चर्चा की। यहाँ यह बात उभरकर सामने आई कि डिजिटल युग में दर्शक स्वयं कंटेंट की दिशा तय कर रहा है।
“नई जबान, नए किस्से” सत्र में नीलोत्पल मृणाल, दिव्यप्रकाश दुबे, प्रवीण कुमार और शैलेश भारतवासी ने समकालीन लेखन की नई शैली और भाषा पर चर्चा की। यह सत्र विशेष रूप से युवा पाठकों और लेखकों के लिए प्रासंगिक रहा।
“शायरी के धनक” में मीनू बख्शी ने अपनी मधुर प्रस्तुति से पूरे वातावरण को भावपूर्ण बना दिया। गजल, संगीत और शब्दों का यह संगम श्रोताओं के लिए एक अविस्मरणीय अनुभव साबित हुआ। इस दौरान मिर्जा गालिब और मोमिन खान मोमिन की रचनाओं ने विशेष रूप से श्रोताओं को प्रभावित किया। कामना प्रसाद ने गजल की संरचना और उसकी ऐतिहासिक यात्रा पर भी रोचक जानकारी साझा की।
“नज्म और नग्में” सत्र में पीयूष मिश्रा और अमित सियाल ने कला, सिनेमा और थिएटर के अनुभव साझा किए। पीयूष मिश्रा ने कहा कि थिएटर उनके लिए सुकून और अभिव्यक्ति का माध्यम है, जबकि अमित सियाल ने ओटीटी प्लेटफॉर्म के बढ़ते प्रभाव और उसके साथ आने वाली चुनौतियों पर प्रकाश डाला। इस सत्र में गीत, अनुभव और संवाद का ऐसा मिश्रण देखने को मिला, जिसने दर्शकों को अंत तक बाँधे रखा।
समापन वक्तव्य में डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने भारतीय भाषाओं, संस्कृति और साहित्य की गहराई को रेखांकित करते हुए कहा कि यह महोत्सव केवल आयोजन नहीं, बल्कि “जीवन के विविध आयामों का उत्सव” है। उन्होंने भारतीय भाषाओं की लयात्मकता, “ढाई आखर प्रेम” की अवधारणा और साहित्य की सामाजिक भूमिका पर विस्तार से विचार रखे। साथ ही युवाओं को अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़े रहने का संदेश दिया।
समापन सत्र में भिखारी ठाकुर रचित लोकनाट्य ‘बिदेसिया’ का मंचन किया गया। संजय उपाध्याय के निर्देशन में प्रस्तुत इस नाटक ने प्रवास, प्रेम और विरह की भावनाओं को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया। लोकधुनों और जीवंत अभिनय ने दर्शकों को भाव-विभोर कर दिया।
हिंदी भवन- परंपरा से भविष्य की ओर एक सशक्त कदम- सत्रों के दौरान एक विशेष वीडियो प्रस्तुति भी दिखाई गई, जिसने हिंदी भवन की ऐतिहासिक यात्रा को अत्यंत भावपूर्ण और प्रभावशाली ढंग से सामने रखा। इस वीडियो में हिंदी भवन की स्थापना से लेकर उसके विकास तक की कहानी को दृश्यात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया, जिसमें लाल बहादुर शास्त्री और पंडित गोपाल प्रसाद व्यास के महत्वपूर्ण प्रयासों और दूरदर्शिता का सजीव चित्रण देखने को मिला। यह प्रस्तुति केवल एक संस्थान के इतिहास का वर्णन नहीं थी, बल्कि उस विचार और समर्पण की झलक थी, जिसने हिंदी भाषा और साहित्य को एक सशक्त मंच प्रदान करने का सपना साकार किया। इस वीडियो के माध्यम से यह स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सका कि हिंदी भवन केवल एक भवन नहीं, बल्कि एक विरासत है, जो आज भी नई पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य कर रही है।
ढाई दिनों तक चला यह साहित्योत्सव यह साबित कर गया कि- शब्द केवल लिखे नहीं जाते, वे जिए जाते हैं। “ढाई आखर” ने यह दिखाया कि साहित्य आज भी जीवित है, प्रासंगिक है और समाज को दिशा देने की क्षमता रखता है। यह एक आयोजन नहीं, बल्कि एक साहित्यिक आंदोलन है- जो विरासत को संजोते हुए भविष्य की राह बना रहा है।