हिन्दी भवन के संस्थापक अध्यक्ष, भारतरत्न, पूर्व प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी की जयंती (02 अक्टूबर-2023) पर उनकी पुनीत स्मृति में हिन्दी भवन न्यास तत्वाधान में विराट अखिल भारतीय कवि सम्मेलन का आयोजन हिन्दी भवन सभागार नई दिल्ली में किया गया। हिन्दी भवन के मंत्री डा. गोविन्द व्यास ने बताया कि यह कोरोना काल के बाद हिन्दी भवन का पहला कार्यक्रम था। उन्होंने हिन्दी भवन की गरिमा के अनुरूप मुख्य अतिथि श्री प्रभात कुमार (झारखण्ड के पूर्व राज्यपाल) तथा कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डा. अशोक चक्रधर सहित सभी कवियों एवं विशेष अतिथियों का पुष्प गुच्छ देकर स्वागत किया तथा सभी ने श्री लाल बहादुर शास्त्री जी को श्रद्धा सुमन समर्पित किए। इस कवि-सम्मेलन का कुशल मंच संचालन डा. प्रवीण शुक्ल ने किया।
उमरिया एक सड़क वीरान। कहाँ मंज़िल है किसको ज्ञान।
न जाने कितना चल आए। मुड़े पीछे तो घबराए।
कहाँ कब छूट गए अपने। छल रहे मायावी सपने।
बुझे मन को, थके तन को, छुअन पछुआ सी दीन्हीं रे।
यादें झीनी रे, झीनी रे, झीनी रे। झीनी-झीनी रे, झीनी-झीनी रे।।
बिकें भी और अच्छी कीमत में न जाएं तो कहाँ जाएं।
मरें भी और जन्नत में न जाएं तो कहाँ जाएं।
यहाँ वारंट है, कुर्की है, कारागार का डर है।
अगर गुंडे सियासत में न जाएं तो कहाँ जाएं।।
मेरे सब पंख कटा दो तुम, सांसों की डोर घटा दो तुम।
कितने भी कारागार बुनो या पहरे लाख बिठा दो तुम।
ये पिंजरा सोने का स्वीकार नहीं मुझको।।
ऑंखों में पानी, दादी की कहानी
प्यार के दो पल, नल-नल में जल
संतों की बानी, कर्ण जैसा दानी
घर में मेहमान, मनुष्यता का सम्मान
पड़ोस की पहचान, रसिकों के कान
ब्रज का फाग, आग में आग
तराजू में बट्टा, और लड़कियों का दुपट्टा
ढूंढते रह जाओगे।
मैनपुरी से आए गीतकार श्री बलराम श्रीवास्तव ने सुनाया ‘वो घर घर नहीं होता, जहाँ बिटिया नहीं होती’। डा. प्रवीण शुक्ल ने श्रोताओं के आग्रह पर अपनी प्रसिद्ध कविता “भीष्म प्रतिज्ञा” सुनाई – कहा कृष्ण ने महासमर में ना अस्त्रों को धरूँगा, मात्र सारथी बनकर अर्जुन को रणक्षेत्र उतारूंगा। जब सुने उन्होंने वचन कृष्ण के मन ही मन मुस्काए, यह सोच चलो मौका आया माधव को झुठलाया जाए। पितामह के यह विचार सुन सहमी-सहमी प्रज्ञा थी, एक ओर कृष्ण प्रतिज्ञा, दूजी ओर भीष्म प्रतिज्ञा थी।।
गीतकार श्री जगदीश सोलंकी ने अपने काव्य पाठ की शुरूआत इन पंक्तियों से की – सीमाओं के प्रहरी गर सीमाओं पर नहीं होते, होली ना दीवाली, कोई तीज ना त्यौहार है। दरवाजे तो क्या है, खिड़की भी खोलने से पहले, सोचते कि बाहर की हवा की क्या रफ्तार है। उनके हौसले का भुगतान क्या करेगा कोई, उनकी शहादत का कर्ज देश पे उधार है। आप और हम इसलिये खुशहाल हैं कि, सीमाओं पे सैनिक शहादत को तैयार है।।
अंत में डा. अशोक चक्रधर ने अपने चिरपरिचित अंदाज में आज की सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था पर व्यंगात्मक चोट की, जिस पर सभी श्रोतागण हंसे बिना न रह सके। अंत में डा. गोविन्द व्यास ने इस कार्यक्रम में आए सभी अतिथियों का धन्यवाद किया।